Jun 22, 2026

सिडकुल इकाइयों को नाबालिग श्रम की आपूर्ति करने के लिए बिचौलियों ने किया गरीबी का बेरहमी से इस्तेमाल

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रूद्रपुर। उत्तराखंड के उधमसिंह नगर जिले के सबसे बड़े औद्योगिक क्षेत्र सिडकुल (पंतनगर) से बाल श्रम का एक बेहद चौंकाने वाला और संवेदनशील मामला सामने आया है। रविवार की रात सिडकुल के सेक्टर 7 स्थित एक थर्माकोल फैक्ट्री में बाल कल्याण समिति की पूर्व अध्यक्ष की अगुवाई में छापेमारी कर रात्रि पाली (नाइट शिफ्ट) में अवैध रूप से काम कर रहे 17 नाबालिग बच्चों का रेस्क्यू किया गया। इस औचक कार्रवाई से फैक्ट्री परिसर में हड़कंप मच गया। ठेकेदार और फैक्ट्री प्रबंधन द्वारा बच्चों को छिपाने की कोशिशों के बीच कई बच्चे अंधेरे का फायदा उठाकर भागने में भी कामयाब रहे। छुड़ाए गए सभी बच्चों की उम्र महज 12 से 14 वर्ष के बीच बताई जा रही है, जिनसे श्रम नियमों की धज्जियां उड़ाकर खतरनाक मशीनों पर काम लिया जा रहा था।

जानकारी के अनुसार, सिडकुल के सेक्टर 7 में स्थित 'दुर्गा फाइबर फैक्ट्री' में नाबालिग बच्चों से मजदूरी कराने की गुप्त सूचना बाल कल्याण समिति की पूर्व अध्यक्ष एवं प्रसिद्ध समाजसेवी डॉ. रजनीश बत्रा को मिली थी। रविवार देर रात जब डॉ. बत्रा अपने साथियों के साथ अचानक फैक्ट्री परिसर में जा पहुंचीं, तो वहां का नजारा देखकर दंग रह गईं। कई मासूम बच्चे भारी मशीनों के बीच थर्माकोल की प्लेटें बना रहे थे। टीम को देखते ही ठेकेदार ने बच्चों को छिपाने के लिए आनन-फानन में एक कमरे में बंद कर ताला जड़ दिया। रेस्क्यू के दौरान जब डॉ. बत्रा को कमरे के भीतर से सिसकियों और बच्चों की फुसफुसाहट की आवाजें आईं, तो उन्होंने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए कमरा खुलवाया। कमरा खुलते ही सहमे हुए बच्चे बाहर निकलकर इधर-उधर भागने लगे, जिनमें से 17 बच्चों को टीम ने सुरक्षित अपने संरक्षण में ले लिया। इस बड़े रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद प्रशासनिक अमले की संवेदनहीनता भी सामने आई है। डॉ. रजनीश बत्रा ने बताया कि आधी रात को रेस्क्यू के बाद उन्होंने तुरंत पुलिस, प्रशासनिक अधिकारियों और चाइल्ड हेल्पलाइन को फोन किया, लेकिन कई अधिकारियों से संपर्क ही नहीं हो सका। मौके पर पहुंचे कुछ पुलिसकर्मियों ने रात के समय बच्चों को अपनी कस्टडी में लेने से साफ मना कर दिया। काफी जद्दोजहद के बाद सभी 17 बच्चों को बाल कल्याण समिति  के पदाधिकारियों को सौंपकर सुरक्षित संरक्षण में भेजा गया। जांच में सामने आया है कि फैक्ट्री का असली मालिक कोलकाता में रहता है और वर्तमान में विदेश यात्रा पर है, जबकि स्थानीय स्तर पर एक व्यक्ति इस फैक्ट्री का संचालन कर रहा है। ठेकेदार इन बच्चों को चंद रुपयों और मामूली खाने का लालच देकर दिन-रात काम करा रहा था। ठेकेदार का मानना था कि "छोटे बच्चे काम में ज्यादा मेहनती होते हैं और शिकायत भी नहीं करते। सिडकुल की इस बड़ी फैक्ट्री से 17 बच्चों के रेस्क्यू के बाद जिले में बाल श्रम उन्मूलन के दावों की पोल खुल गई है। स्थानीय जनता और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने श्रम विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। आरोप है कि श्रम विभाग का पूरा अभियान केवल बाजारों, चाय के खोखों और छोटी दुकानों तक ही सीमित रहता है, जहां गरीब दुकानदारों पर कार्रवाई कर लक्ष्य पूरा दिखा दिया जाता है। लेकिन, सिडकुल और उधमसिंह नगर के बड़े औद्योगिक क्षेत्रों में स्थापित फैक्ट्रियों के बंद दरवाजों के पीछे क्या चल रहा है, इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। यदि सामाजिक संगठन आधी रात को जाकर बच्चों को छुड़ा सकते हैं, तो मोटी तनख्वाह पाने वाले श्रम विभाग के अधिकारी इन फैक्ट्रियों का औचक निरीक्षण क्यों नहीं करते? मामला तूल पकड़ने और मीडिया में आने के बाद प्रशासनिक अमला अब पूरी तरह अलर्ट मोड पर है। बाल कल्याण समिति और विभागीय अधिकारियों द्वारा छुड़ाए गए बच्चों और उनके परिजनों को बुलाकर आवश्यक पूछताछ की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि नियमों का उल्लंघन करने वाली संबंधित फैक्ट्री और अवैध रूप से बच्चों की आपूर्ति करने वाले ठेकेदार के खिलाफ सख्त धाराओं में मुकदमा दर्ज कर विधिक कार्रवाई की जा रही है। अब देखना यह है कि क्या सिडकुल की अन्य फैक्ट्रियों में भी ऐसा जांच अभियान चलेगा या यह मामला भी ठंडे बस्ते में चला जाएगा।