Jun 19, 2026

गंगोलीहाट में ₹100 करोड़ की पेयजल योजनाओं पर गहराया विवाद! Pre-PIL नोटिस का 40 दिन बाद भी जवाब नहीं

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गंगोलीहाट/पिथौरागढ़। गंगोलीहाट विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत चल रही चार बहुकरोड़ पम्पिंग पेयजल योजनाओं की जमीनी हकीकत और कार्यों में अत्यधिक देरी को लेकर क्षेत्र में प्रशासनिक और कानूनी सरगर्मी बढ़ गई है। सामाजिक कार्यकर्ता डीएस सुगड़ा द्वारा बीते 12 मई 2026 को उत्तराखण्ड पेयजल संसाधन विकास एवं निर्माण निगम सहित संबंधित उच्चाधिकारियों को भेजे गए Pre-PIL (जनहित याचिका से पूर्व) लीगल नोटिस का 40 दिन से अधिक समय बीत जाने के बाद भी विभाग द्वारा कोई अंतिम और बिंदुवार जवाब नहीं दिया गया है। इस कानूनी नोटिस के माध्यम से क्षेत्र की चार प्रमुख पेयजल योजनाओं—बेलपट्टी पम्पिंग योजना (₹44.56 करोड़), ग्वासीकोट पम्पिंग योजना (₹8.10 करोड़), पोखरी-भेरंग पम्पिंग योजना (₹19.84 करोड़) और वासुकीनाग पम्पिंग योजना (₹25.74 करोड़)—की वर्तमान कार्य प्रगति, गुणवत्ता परीक्षण, वित्तीय स्थिति और अधिकारियों की जवाबदेही पर स्पष्टीकरण मांगा गया था। हालांकि 21 मई 2026 को विभागीय स्तर पर मामले को आगे बढ़ाते हुए संबंधित अधिकारियों को जांच और त्वरित कार्रवाई के निर्देश जारी किए गए थे, लेकिन धरातल पर अब तक कोई तथ्यात्मक रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है। सूचना के अधिकार (आरटीआई) से प्राप्त दस्तावेजों के हवाले से सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया कि इन महत्वपूर्ण परियोजनाओं में धन आवंटन में देरी और निर्माण कार्यों में पाई गई गंभीर कमियों के कारण संबंधित ठेकेदारों पर ₹50 लाख से अधिक की पेनल्टी भी लगाई जा चुकी है। इसके बावजूद विभाग द्वारा इस पूरे मामले पर चुप्पी साधे रखना और स्थिति स्पष्ट न करना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। पूर्व में विभाग ने आरटीआई के जवाब में लिखित आश्वासन दिया था कि अक्टूबर 2025 तक इन योजनाओं से जलापूर्ति सुचारू कर दी जाएगी, जबकि ग्वासीकोट पम्पिंग योजना के पूरे होने की अंतिम तिथि जुलाई 2024 तय थी। निर्धारित समयसीमा समाप्त होने के लंबे समय बाद भी योजनाएं पूर्ण रूप से संचालित नहीं हो सकी हैं। ऐसे में यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि आखिर किन आधारों पर ठेकेदारों को बार-बार कार्य जारी रखने की छूट दी जा रही है और इस भारी लेटलतीफी के लिए विभाग में कौन उत्तरदायी है। अभिलेखों और धरातलीय स्थिति में साफ अंतर दिखने के बाद अब मामले को अदालत में ले जाने की तैयारी तेज हो गई है। सामाजिक कार्यकर्ता डी एस सुगड़ा का कहना है कि Pre-PIL नोटिस भेजने का मुख्य उद्देश्य न्यायालय की शरण में जाने से पहले विभाग को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का एक मौका देना था। यदि विभाग द्वारा जल्द ही इस विषय पर कोई आधिकारिक, तथ्यात्मक और संतोषजनक स्पष्टीकरण जारी नहीं किया जाता है, तो उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर माननीय उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की जाएगी।