Aug 03, 2026

धामी सरकार की ऐतिहासिक पहल: देवभूमि बनेगी 'साहित्यिक पर्यटन' की नई राजधानी, उत्तराखंड में बनेंगे दो मॉडल 'साहित्य ग्राम'

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देहरादून। योग, आध्यात्म, प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक पर्यटन के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध उत्तराखंड अब एक नई पहचान की ओर कदम बढ़ा रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य सरकार ने उत्तराखंड को 'साहित्यिक पर्यटन' का राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय केंद्र बनाने की महत्वाकांक्षी योजना तैयार की है। इसके तहत गढ़वाल और कुमाऊं मंडल में दो मॉडल 'साहित्य ग्राम' स्थापित किए जाएंगे। साथ ही प्रदेश में बिखरी दुर्लभ पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण, संरक्षण और अप्रकाशित साहित्य के प्रकाशन का व्यापक अभियान भी शुरू किया जाएगा। राज्य सरकार का मानना है कि उत्तराखंड केवल देवभूमि ही नहीं, बल्कि महान साहित्यकारों और लोकभाषाओं की समृद्ध परंपरा की भी भूमि है। इसी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और साहित्य को पर्यटन से जोड़ने के उद्देश्य से यह महत्वाकांक्षी पहल की जा रही है। योजना के अनुसार गढ़वाल और कुमाऊं में एक-एक 'साहित्य ग्राम' विकसित किया जाएगा। कुमाऊं क्षेत्र में कौसानी, जो राष्ट्रकवि सुमित्रानंदन पंत की जन्मस्थली है, रामगढ़, जो महादेवी वर्मा की कर्मभूमि रही, तथा मसूरी, जिसे प्रसिद्ध लेखक रस्किन बॉन्ड समेत कई साहित्यकारों की रचनाधर्मिता का केंद्र माना जाता है, जैसी साहित्यिक विरासत को इन परियोजनाओं से नई पहचान मिलेगी। इन साहित्य ग्रामों में आधुनिक डिजिटल और पारंपरिक पुस्तकालय, राइटर्स रेजीडेंसी, शोध एवं प्रशिक्षण केंद्र, कार्यशाला कक्ष, पांडुलिपि संग्रहालय और ओपन-एयर थिएटर विकसित किए जाएंगे। यहां देश-विदेश के लेखक, शोधार्थी और साहित्य प्रेमी शांत वातावरण में अध्ययन, शोध और लेखन कार्य कर सकेंगे।

उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर का बड़ा हिस्सा आज भी गांवों, निजी संग्रहों और पुराने मकानों में सुरक्षित है, लेकिन उचित संरक्षण के अभाव में अनेक दुर्लभ पांडुलिपियां नष्ट होने की कगार पर हैं। इसे देखते हुए संस्कृति एवं भाषा विभाग विशेष अभियान चलाकर इन पांडुलिपियों को एकत्र करेगा और उनका उच्च गुणवत्ता के साथ डिजिटलीकरण कराया जाएगा। इसके अलावा ऐसे साहित्यकारों की अप्रकाशित रचनाओं को भी प्रकाशित किया जाएगा, जो आर्थिक अभाव या अन्य कारणों से अब तक पाठकों तक नहीं पहुंच सकीं। सरकार इसके लिए आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराएगी, ताकि साहित्यिक धरोहर सुरक्षित रह सके। धामी सरकार ने प्रदेश की साहित्यिक और भाषाई विरासत को बढ़ावा देने के लिए कई नए सम्मान और पुरस्कारों की भी शुरुआत की है। भाषा संस्थान द्वारा आयोजित वार्षिक समारोह में हिंदी, गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी, उर्दू और पंजाबी भाषा के उत्कृष्ट साहित्यकारों को नकद पुरस्कार, प्रशस्ति पत्र और अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया जाएगा। जीवनभर साहित्य और लोकभाषाओं की सेवा करने वाले वरिष्ठ साहित्यकारों को विशेष सम्मान देकर उनकी रचनात्मक यात्रा को नई पहचान और आर्थिक संबल प्रदान करने का भी निर्णय लिया गया है। सरकार का मानना है कि इससे युवा पीढ़ी साहित्य और मातृभाषाओं की ओर अधिक आकर्षित होगी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि उत्तराखंड वीरों और संतों की भूमि होने के साथ-साथ महान साहित्यकारों की भी कर्मभूमि रहा है। सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, पीतांबर दत्त बड़थ्वाल, शैलेश मटियानी और शिवानी जैसी विभूतियों ने राज्य को वैश्विक पहचान दिलाई है। अब उनकी विरासत को संरक्षित करना सरकार की प्राथमिकता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि साहित्य ग्राम केवल सांस्कृतिक केंद्र नहीं होंगे, बल्कि ग्रामीण विकास और पर्यटन को नई दिशा देने वाले मॉडल भी बनेंगे। कौसानी, रामगढ़, मसूरी और लैंसडाउन जैसे क्षेत्रों में जब देश-विदेश से साहित्य प्रेमी पहुंचेंगे तो स्थानीय होमस्टे, होटल, हस्तशिल्प, परिवहन, गाइड और स्थानीय उत्पादों से जुड़े लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। राज्य सरकार का मानना है कि यह पहल उत्तराखंड को साहित्य, संस्कृति और पर्यटन के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएगी। प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक विरासत के साथ अब साहित्यिक धरोहर भी उत्तराखंड की नई पहचान बनेगी और देवभूमि दुनिया भर के साहित्य प्रेमियों के लिए एक प्रेरणादायी गंतव्य के रूप में उभरेगी।