Mar 21, 2026

हाईकोर्ट की निगरानी में मतदाता सूची: दोहरी आईडी के खिलाफ आयोग के अभियान को मिला कानूनी बल

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देहरादून। उत्तराखंड में मतदाता सूची को शुद्ध और पारदर्शी बनाने की दिशा में बड़ी कार्रवाई की तैयारी शुरू हो गई है। निर्वाचन आयोग द्वारा चलाए जा रहे प्री-विशेष गहन पुनरीक्षण (प्री-एसआईआर) के दौरान राज्य में दोहरी वोटर आईडी से जुड़े करीब दो लाख संदिग्ध मामलों की पहचान की गई है। इन मामलों को लेकर आयोग ने गंभीरता से जांच शुरू कर दी है और जल्द ही संबंधित मतदाताओं को नोटिस जारी किए जाएंगे।

जानकारी के अनुसार मतदाता सूची की प्रारंभिक जांच के दौरान बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां एक ही व्यक्ति का नाम अलग-अलग क्षेत्रों की मतदाता सूची में दर्ज पाया गया है। कई मामलों में मतदाता का नाम ही नहीं, बल्कि पिता का नाम भी समान पाया गया, जिससे दोहरी पंजीकरण की आशंका मजबूत हुई है। ऐसे में आयोग अब यह सुनिश्चित करने में जुटा है कि प्रत्येक मतदाता का नाम केवल एक ही स्थान पर दर्ज हो। सूत्रों के मुताबिक, प्री-एसआईआर के दौरान सामने आए करीब दो लाख संदिग्ध मामलों की विस्तृत जांच की जा रही है। आयोग संबंधित मतदाताओं को नोटिस भेजकर स्पष्टीकरण मांगेगा, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि वास्तव में कितने लोग दो जगहों की मतदाता सूची में शामिल हैं। जांच के बाद यदि दोहरी प्रविष्टि की पुष्टि होती है तो एक स्थान से नाम हटाने की कार्रवाई की जाएगी। राज्य के पर्वतीय और मैदानी दोनों क्षेत्रों में ऐसे मामले सामने आए हैं, लेकिन सबसे अधिक संदिग्ध प्रकरण देहरादून जिले में पाए गए हैं। इसके चलते आयोग ने इस जिले पर विशेष फोकस किया है और गहन जांच की प्रक्रिया तेज कर दी है।

इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं का आरोप है कि दोहरी वोटर आईडी का इस्तेमाल चुनाव को प्रभावित करने के लिए किया जाता है और यह एक राजनीतिक षड्यंत्र का हिस्सा हो सकता है। कांग्रेस नेता अमरेंद्र बिष्ट ने कहा कि आयोग को ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई करते हुए मतदाताओं का नाम केवल एक ही स्थान पर सुनिश्चित करना चाहिए। वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी भी इस मुद्दे पर कार्रवाई के पक्ष में नजर आ रही है। कैबिनेट मंत्री खजान दास ने कहा कि निर्वाचन आयोग प्री-एसआईआर के तहत बेहतर काम कर रहा है और दोहरी वोटर आईडी के मामलों में भी आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। गौरतलब है कि दोहरी मतदाता सूची का मामला पहले भी राज्य में विवाद का विषय रहा है। पंचायत चुनावों के दौरान यह मुद्दा काफी चर्चा में आया था, जिसके बाद उत्तराखंड हाईकोर्ट ने ऐसे प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने से रोकने के निर्देश दिए थे, जिनके नाम दो अलग-अलग स्थानों की मतदाता सूची में दर्ज थे। वर्तमान में भी ऐसे करीब 800 से 1000 मामले विभिन्न अदालतों में विचाराधीन हैं। समाजसेवी शक्ति सिंह का कहना है कि दोहरी वोटर आईडी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है, जिससे चुनाव परिणामों की निष्पक्षता पर सवाल उठता है। उन्होंने आयोग से इस मामले में सख्ती बरतने की मांग की है। कुल मिलाकर, प्री-एसआईआर के दौरान सामने आए ये मामले चुनावी पारदर्शिता के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरे हैं। अब सभी की नजरें निर्वाचन आयोग की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं, जिससे यह तय होगा कि राज्य में मतदाता सूची कितनी साफ और विश्वसनीय बन पाती है।